फैटी लिवर अक्सर पता क्यों नहीं चलता
लगभग हर तीन में से एक भारतीय वयस्क के लिवर में चर्बी जमा हो रही है। कई लोगों को इसका पता ही नहीं होता।
लिवर की बीमारी शुरुआती दौर में अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाती। लिवर काफ़ी बोझ उठाते हुए भी काम करता रह सकता है, इसलिए समस्याएँ सालों तक पकड़ में नहीं आतीं।
फ़ैटी लिवर क्या है
स्वस्थ लिवर में थोड़ी चर्बी होती है। जब उसके वज़न का लगभग पाँच प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा चर्बी हो, तो डॉक्टर इसे फ़ैटी लिवर कहते हैं। अगर कारण शराब नहीं है, तो इसे नॉन-एल्कोहॉलिक फ़ैटी लिवर डिज़ीज़ (NAFLD) कहते हैं। डॉक्टर अब एक नया नाम ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, मेटाबॉलिक डिसफ़ंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिज़ीज़, जो वज़न, कमर और ब्लड शुगर से इसके संबंध को बेहतर दर्शाता है।
यह कितना आम है
पचास भारतीय अध्ययनों को जोड़ने वाले 2022 के एक विश्लेषण का अनुमान है कि 38.6 प्रतिशत भारतीय वयस्कों को फ़ैटी लिवर है। डायबिटीज़ या मोटापे जैसे जोखिम वाले लोगों में यह आँकड़ा आधे से ज़्यादा था। बच्चे भी अछूते नहीं: संयुक्त अनुमान एक-तिहाई से ज़्यादा था।
भारत की व्यापक मेटाबॉलिक तस्वीर के साथ ये आँकड़े समझ में आते हैं। ICMR-INDIAB अध्ययन में पाया गया कि लगभग दस में से चार वयस्कों की कमर के आसपास अतिरिक्त वज़न है, और चर्बी का यही रूप लिवर से सबसे ज़्यादा जुड़ा है।
यह क्यों मायने रखता है
कई लोगों में फ़ैटी लिवर स्थिर रहता है। कुछ में चर्बी से सूजन होती है, और सालों में यह सूजन ज़ख़्म, यानी फ़ाइब्रोसिस, में बदल सकती है। फ़ैटी लिवर शरीर में दूसरी जगह जोखिम का भी संकेत है, ख़ासकर डायबिटीज़ और दिल की बीमारी का।
क्या मदद करता है
अच्छी ख़बर यह है कि लिवर बदलाव पर जल्दी प्रतिक्रिया देता है।
- वज़न से पहले कमर। शरीर के वज़न का पाँच से दस प्रतिशत भी धीरे-धीरे घटाने से लिवर की चर्बी काफ़ी कम हो सकती है।
- पीने वाली चीनी कम करें। मीठे पेय और पैकेट वाले जूस ऐसी चीनी देते हैं जिसे लिवर चर्बी में बदल सकता है।
- ज़्यादातर दिन सक्रिय रहें। नियमित गतिविधि वज़न बदलने से पहले ही लिवर की चर्बी कम कर सकती है।
- शराब से सावधान रहें। फ़ैटी लिवर और शराब का मेल ठीक नहीं।
- जाँच के बारे में पूछें। अगर आपको डायबिटीज़ है, कमर ज़्यादा है या लिवर एंज़ाइम बढ़े हुए हैं, तो डॉक्टर से पूछें कि क्या अल्ट्रासाउंड या एक आसान फ़ाइब्रोसिस स्कोर आपके लिए सही है।
महीनों तक बनाए रखे गए छोटे, लगातार बदलाव ही असली फ़र्क़ लाते हैं।
स्रोत
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है और किसी योग्य डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं लेता।